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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
स रराज तथा सङ्ख्ये दर्शनीय़ो नरोत्तमः |  ३४   क
निर्विशेषं महाराज यथा हि विजय़स्तथा ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति