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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
वर्म भित्त्वा तु सौवर्णं वाणास्तस्य महात्मनः |  ४९   क
न्यमज्जन्त महाराज कङ्कवर्हिणवाससः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति