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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
हताश्वं रथमुत्सृज्य त्वरमाणो नरोत्तमः |  ६३   क
तस्थौ विस्फारय़ंश्चापं क्रोधरक्तेक्षणः श्वसन् |  ६३   ख
शरैश्च वहुधा राजन्भीममार्च्छत्समन्ततः ||  ६३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति