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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
पराङ्मुखं तु राजानं दृष्ट्वा सैन्यानि भारत |  ६९   क
विप्रजग्मुः समुत्सृज्य द्वैरथानि समन्ततः ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति