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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
सर्पोत्सर्गस्य शय़ने विषदानस्य भोजने |  २०   क
प्रमाणकोट्यां पातस्य दाहस्य जतुवेश्मनि ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति