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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
राज्ञश्च धृतराष्ट्रस्य तथा त्वमपि चात्मनः |  २८   क
स्मर तद्दुष्कृतं कर्म यद्वृत्तं वारणावते ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति