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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
वने दुःखं च यत्प्राप्तमस्माभिस्त्वत्कृतं महत् |  ३०   क
विराटनगरे चैव योन्यन्तरगतैरिव |  ३०   ख
तत्सर्वं यातय़ाम्यद्य दिष्ट्या दृष्टोऽसि दुर्मते ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति