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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
हतो द्रोणश्च कर्णश्च तथा शल्यः प्रतापवान् |  ३२   क
वैराग्नेरादिकर्ता च शकुनिः सौवलो हतः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति