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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
नैव दुर्योधनः क्षुद्र केनचित्त्वद्विधेन वै |  ३७   क
शक्यस्त्रासय़ितुं वाचा यथान्यः प्राकृतो नरः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति