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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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वैशम्पाय़न उवाच
भूत्वा हि जगतो नाथो ह्यनाथ इव मे सुतः |  ४   क
गदामुद्यम्य यो याति किमन्यद्भागधेय़तः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति