वन पर्व  अध्याय ७२

वाहुक उवाच

इहैव पुत्रौ निक्षिप्य नलस्याशुभकर्मणः |  १४   क
गतस्ततो यथाकामं नैष जानाति नैषधम् ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति