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आदि पर्व
अध्याय १२८
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रमृद्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मय़ा |  ७   क
प्राप्य जीवन्रिपुवशं सखिपूर्वं किमिष्यते ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति