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शान्ति पर्व
अध्याय ५६
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भीष्म उवाच
मृदुर्हि राजा सततं लङ्घ्यो भवति सर्वशः |  २१   क
तीक्ष्णाच्चोद्विजते लोकस्तस्मादुभय़माचर ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति