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शान्ति पर्व
अध्याय ५६
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भीष्म उवाच
तस्मान्नैव मृदुर्नित्यं तीक्ष्णो वापि भवेन्नृपः |  ४०   क
वसन्तेऽर्क इव श्रीमान्न शीतो न च घर्मदः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति