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शान्ति पर्व
अध्याय ५६
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भीष्म उवाच
नित्यं हि व्यसनी लोके परिभूतो भवत्युत |  ४३   क
उद्वेजय़ति लोकं चाप्यतिद्वेषी महीपतिः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति