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आदि पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा ह्याहवनीय़ोऽग्निर्गार्हपत्यात्प्रणीय़ते |  ६५   क
तथा त्वत्तः प्रसूतोऽय़ं त्वमेकः सन्द्विधा कृतः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति