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शान्ति पर्व
अध्याय ५६
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भीष्म उवाच
परिहासश्च भृत्यैस्ते न नित्यं वदतां वर |  ४८   क
कर्तव्यो राजशार्दूल दोषमत्र हि मे शृणु ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति