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शान्ति पर्व
अध्याय ५६
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा हि रश्मय़ोऽश्वस्य द्विरदस्याङ्कुशो यथा |  ५   क
नरेन्द्रधर्मो लोकस्य तथा प्रग्रहणं स्मृतम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति