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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
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सौदास उवाच
निक्षिप्तमेतद्भुवि पन्नगास्तु; रत्नं समासाद्य परामृषेय़ुः |  २३   क
यक्षास्तथोच्छिष्टधृतं सुराश्च; निद्रावशं त्वा परिधर्षय़ेय़ुः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति