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आदि पर्व
अध्याय ३
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सूत उवाच
एकं चक्रं वर्तते द्वादशारं प्रधि; षण्णाभिमेकाक्षममृतस्य धारणम् |  ६५   क
यस्मिन्देवा अधि विश्वे विषक्ता; स्तावश्विनौ मुञ्चतो मा विषीदतम् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति