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सभा पर्व
अध्याय ५६
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विदुर उवाच
प्रातिपीय़ाः शान्तनवाश्च राज; न्काव्यां वाचं शृणुत मात्यगाद्वः |  ७   क
वैश्वानरं प्रज्वलितं सुघोर; मय़ुद्धेन प्रशमय़तोत्पतन्तम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति