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वन पर्व
अध्याय ५६
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वृहदश्व उवाच
राजन्पौरजनो द्वारि त्वां दिदृक्षुरवस्थितः |  १५   क
मन्त्रिभिः सहितः सर्वै राजभक्तिपुरस्कृतः |  १५   ख
तं द्रष्टुमर्हसीत्येवं पुनः पुनरभाषत ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति