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वन पर्व
अध्याय ५६
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वृहदश्व उवाच
स समाविश्य तु नलं समीपं पुष्करस्य ह |  ४   क
गत्वा पुष्करमाहेदमेहि दीव्य नलेन वै ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति