वन पर्व  अध्याय ५६

वृहदश्व उवाच

अक्षद्यूते नलं जेता भवान्हि सहितो मय़ा |  ५   क
निषधान्प्रतिपद्यस्व जित्वा राजन्नलं नृपम् ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति