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द्रोण पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
पताकी काञ्चनस्रग्वी ध्वजः कर्णस्य संय़ुगे |  १३   क
नृत्यतीव रथोपस्थे श्वसनेन समीरितः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति