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विराट पर्व
अध्याय ५६
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वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णपृष्ठं गाण्डीवं द्रक्ष्यन्ति कुरवो मम |  ४   क
दक्षिणेनाथ वामेन कतरेण स्विदस्यति |  ४   ख
इति मां सङ्गताः सर्वे तर्कय़िष्यन्ति शत्रवः ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति