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विराट पर्व
अध्याय ५६
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वैशम्पाय़न उवाच
असम्भ्रान्तो रथे तिष्ठ समेषु विषमेषु च |  ८   क
दिवमावृत्य तिष्ठन्तं गिरिं भेत्स्यामि धारिभिः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति