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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
किं नु शक्यं मय़ा कर्तुं यत्त्वमद्यापि मानुषम् |  २८   क
आहारभूतमस्माकं राममेवानुरुध्यसे ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति