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उद्योग पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
स त्वं शूरश्च वीरश्च विक्रान्तश्च नरर्षभ |  ५४   क
भय़ार्तानां परित्राता संय़ुगेषु न संशय़ः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति