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भीष्म पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
गजैर्विषाणैर्वरहस्तरुग्णाः; केचित्ससूता रथिनः प्रपेतुः |  १८   क
गजर्षभाश्चापि रथर्षभेण; निपेतिरे वाणहताः पृथिव्याम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति