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भीष्म पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
तथैव शक्रप्रतिमानकल्प; मिन्द्रात्मजं द्रोणमुखाभिसस्रुः |  २२   क
कृपश्च शल्यश्च विविंशतिश्च; दुर्योधनः सौमदत्तिश्च राजन् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति