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वन पर्व
अध्याय ५७
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वृहदश्व उवाच
जानीषे त्वं यथा राजा सम्यग्वृत्तः सदा त्वय़ि |  १२   क
तस्य त्वं विषमस्थस्य साहाय़्यं कर्तुमर्हसि ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति