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विराट पर्व
अध्याय ६६
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरां प्रतिगृह्णातु सव्यसाची धनञ्जय़ः |  २७   क
अय़ं ह्यौपय़िको भर्ता तस्याः पुरुषसत्तमः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति