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द्रोण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
सोऽहं श्वस्तत्करिष्यामि यथा कुन्तीसुतोऽर्जुनः |  २२   क
अप्राप्तेऽस्तं दिनकरे हनिष्यति जय़द्रथम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति