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वन पर्व
अध्याय ७३
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वृहदश्व उवाच
सा शङ्कमाना भर्तारं नलं वाहुकरूपिणम् |  १९   क
केशिनीं श्लक्ष्णय़ा वाचा रुदती पुनरव्रवीत् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति