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द्रोण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
अनर्जुनमिमं लोकं मुहूर्तमपि दारुक |  २४   क
उदीक्षितुं न शक्तोऽहं भविता न च तत्तथा ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति