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द्रोण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
श्वो निरीक्षन्तु मे वीर्यं त्रय़ो लोका महाहवे |  २६   क
धनञ्जय़ार्थं समरे पराक्रान्तस्य दारुक ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति