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द्रोण पर्व
अध्याय ५६
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दारुक उवाच
जय़ एव ध्रुवस्तस्य कुत एव पराजय़ः |  ४०   क
यस्य त्वं पुरुषव्याघ्र सारथ्यमुपजग्मिवान् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति