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कर्ण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
नापि स्वे न परे योधाः प्राज्ञाय़न्त परस्परम् |  ४१   क
घोरे शरान्धकारे तु कर्णास्त्रे च विजृम्भिते ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति