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कर्ण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
मृगसङ्घान्यथा क्रुद्धः सिंहो द्रावय़ते वने |  ४४   क
कर्णस्तु समरे योधांस्तत्र तत्र महाय़शाः |  ४४   ख
कालय़ामास तत्सैन्यं यथा पशुगणान्वृकः ||  ४४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति