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विराट पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
साय़ुधाश्च वय़ं तात प्रवेक्ष्यामः पुरं यदि |  १०   क
समुद्वेगं जनस्यास्य करिष्यामो न संशय़ः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति