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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
समापेततुरानद्य शृङ्गिणौ वृषभाविव |  २   क
महानिर्घातघोषश्च सम्प्रहारस्तय़ोरभूत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति