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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
एवं तौ विचरन्तौ तु न्यघ्नतां वै परस्परम् |  २०   क
वञ्चय़न्तौ पुनश्चैव चेरतुः कुरुसत्तमौ ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति