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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
तां नामृष्यत कौरव्यो गदां प्रतिहतां रणे |  ३९   क
मत्तो द्विप इव क्रुद्धः प्रतिकुञ्जरदर्शनात् ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति