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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
तथा तस्मिन्महाय़ुद्धे वर्तमाने सुदारुणे |  ५   क
खद्योतसङ्घैरिव खं दर्शनीय़ं व्यरोचत ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति