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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
स तु तेन प्रहारेण मातङ्ग इव रोषितः |  ५०   क
हस्तिवद्धस्तिसङ्काशमभिदुद्राव ते सुतम् ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति