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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रणेदुर्जहृषुश्च पाण्डवाः; समीक्ष्य पुत्रं पतितं क्षितौ तव |  ६२   क
ततः सुतस्ते प्रतिलभ्य चेतनां; समुत्पपात द्विरदो यथा ह्रदात् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति