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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्तरिक्षे निनदो महानभू; द्दिवौकसामप्सरसां च नेदुषाम् |  ६५   क
पपात चोच्चैरमरप्रवेरितं; विचित्रपुष्पोत्करवर्षमुत्तमम् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति