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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तादुपलभ्य चेतनां; प्रमृज्य वक्त्रं रुधिरार्द्रमात्मनः |  ६७   क
धृतिं समालम्व्य विवृत्तलोचनो; वलेन संस्तभ्य वृकोदरः स्थितः ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति