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आदि पर्व
अध्याय ३८
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शृङ्ग्यु उवाच
यद्येतत्साहसं तात यदि वा दुष्कृतं कृतम् |  १   क
प्रिय़ं वाप्यप्रिय़ं वा ते वागुक्ता न मृषा मय़ा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति